बंगाल हिंसा का मामला CBI के पास.. बंगाल सरकार फैसले से नाखुश

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बंगाल हिंसा का मामला CBI के पास.. बंगाल सरकार फैसले से नाखुश


कोलकाता. बंगाल में हिंसा के दौरान हुई हत्या और बलात्कार के मामले (West Bengal Violence Case) की जांच को अदालत ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया है. पश्चिम बंगाल सरकार भले ही इस फैसले से नाखुश हो लेकिन उसे अदालत के फैसले का सम्मान करते हुए कानून को अपना काम करने देना चाहिए. इससे ये भी साफ हो जाएगा की राज्य के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है. ऐसे हालात में जब इस हिंसा को पूरी तरह से राज्य प्रायोजित और चुनावी जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस के विपक्ष पर हमले की तरह देखा जा रहा है, अगर राज्य पुलिस को किसी भी तरह से जिम्मेदारी सौपी जाती है तो उससे जनता का आत्मविश्वास डगमगा सकता है. इस मामले में मुख्यमंत्री ने शुरुआत में हिंसा को कम करके पेश किया था. जिसकी वजह से पुलिसिया कार्यवाही पर भी सवाल खड़े हुए.

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले के जरिए एक बेहतर संतुलन स्थापित करते हुए हत्या और बलात्कार से जुड़े जघन्य मामलों को सीबीआई को सौंपा है, वहीं जान-माल के नुकसान से जुड़े अन्य मामलों के लिए पश्चिम बंगाल कैडर के तीन अधिकारियों का एक विशेष जांच दल गठित किया है. फैसले के मुताबिक दोनों ही जांच अदालत की निगरानी में की जाएगी. हालांकि राजनीति से जुड़े कई मामलों में सीबीआई ने कोई बेहतर मिसाल पेश नहीं की है लेकिन देश की प्रमुख एजेंसी की जांच जो वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित होती है, जनता के बीच भरोसा कायम करने में मदद कर सकती है, इसके साथ ही अदालत की निगरानी में हो रही जांच ज्यादा भरोसेमंद मानी जा सकती है ऐसे में पीड़ित बगैर डर के आगे आने को प्रोत्साहित होगा.

पश्चिम बंगाल पुलिस का रवैया खड़े कर रहा सवाल
चुनाव के बाद भड़की हिंसा को संभालने को लेकर पश्चिम बंगाल पुलिस का अब तक का रवैया बहुत से सवाल खड़े करता है और तीन महीने गुजर जाने के बाद कार्यवाही को लेकर राज्य सरकार का जो सुस्त रवैया रहा है उसे देखकर ये कहा जा सकता है कि उन्होंने खुद ही सीबीआई को जांच के लिए आमंत्रित कर लिया है. मसलन- अदालत के फैसले में बताया गया कि एनएचआरसी की फाइनल रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल पुलिस ने जितने लोगों को गिरफ्तार किया उसमें से बमुश्किल 14 फीसद आरोपियों के नाम पर एफआईआर लिखी गई, और 80 फीसद लोगों को जमानत पर रिहा कर दिया गया. कुल मिलाकर महज 3 फीसद आरोपी ही जेल गए.

अदालत ने बताया ने मामले को भटकाने के लिए राज्य सरकार ने अपनी सारी ऊर्जा एनएचआरसी की रिपोर्ट को मंथर करने के लिए दिए गए 10000 पेज के प्रत्युत्तर देने में लगा दी.

18 जून को अदालत के एक आदेश जारी करने पर राज्यों के उस पर रोक लगाने के लिए अर्जी दायर करने के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने एनएचआरसी की कवायद को पहले ही रोकने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने इस अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जहां राज्यों से तुरंत कार्यवाही की दरकार थी, वहीं उन्होंनें विश्वास अर्जित नहीं किया, जांच के लिए सीबीआई को सौंपे गए 20 मामलों को लेकर अदालत का कहना था इन मामलों पर राज्य का रवैया काफी ढुलमुल था. अदालत ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हुए जघन्य बलात्कार मामले में भी राज्य ने उचित कदम नहीं उठाए. जो राज्य सरकार की ढिलाई का एक नायाब उदाहरण पेश करती है. इसलिए ये सभी मामले सीबीआई को सौंपे जाते हैं.

सरकार की ओर से पेश की गई अजीबोगरीब दलीलें
अदालत ने कहा कि सरकार की ओर से अजीबोगरीब दलीलें पेश की गई, जैसे महिलाओं के खिलाफ हुए आपराधिक मामलों में एनएचआरसी को मेडिकल रिपोर्ट जमा करनी थी जैसे कि मामला दर्ज हो जाने के बाद उस पर तुरंत कार्यवाही करना पुलिस का काम नहीं था. ये सब बातें जाहिर करती हैं कि सबूत मिटाने के लिए ये एक सोची समझी चुप्पी थी. बलात्कार के मामले में वर्तमान कानून के मुताबिक जिसे निर्भया मामले के बाद सख्त किया गया है बलात्कार मामले की उच्च स्तरीय जांच समय सीमा पर होनी चाहिए और साथ ही 164 सीआरपीसी के तहत पीड़ित का बयान रिकॉर्ड करना अनिवार्य है, सीबीआई ये काम निष्ठापूर्वक करती है. जबकि इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार का ढीला रवैया जाहिर होता है.

चुनाव के बाद की हिंसा राज्यव्यापी थी जिसमें जघन्य अपराध शामिल थे और इसमें उन लोगों को निशाना बनाया गया जिन्होंने सत्ताधारी पार्टी का समर्थन नहीं किया था, अदालत के फैसले में कहा गया कि सामाजिक बहिष्कार, पलायन और राजनीतिक विरोधियों की संपत्ति को नष्ट करने को भी अदालत ने अपने फैसले में एक तरह के मामलों के रूप में दर्ज किया है। अदालत ने पीड़ितों के बीच विश्वास जगाने के लिए सीबीआई और एसआईटी जांच को सही ठहराते हुए कहा, “तीन महीने बीत चुके हैं, राज्य की ओर से हज़ारो कागज़ात रिकॉर्ड करने और शपध पत्र दाखिल करने के अलावा कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई है.

हो सकता है कि बंगाल सरकार सीबीआई पर केंद्र की “कठपुतली” होने का आरोप लगाए. और सीबीआई की जांच को राजनीतिक रूप से प्रेरित होने का दावा कर सकती है, लेकिन तथ्य यह है कि इस तरह की जांच पीड़ितों के लिए न्याय पाने का सबसे अच्छा मौका है और टीएमसी सरकार को इसमें अड़ंगा नहीं लगाना चाहिए.

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