Kalai Art in Hindi: क्या है लखनऊ की कलाई कला? क्या करते हैं कलाईवाले? यहां समझें पूरा प्रॉसेस

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Kalai Art in Hindi: क्या है लखनऊ की कलाई कला? क्या करते हैं कलाईवाले? यहां समझें पूरा प्रॉसेस


हाइलाइट्स

  • क्या है कलाई कला?
  • जानें कैसे कारीगर करते हैं काम
  • कहां से शुरु हुई यह कला?

Everything About Dying Art Of Kalai: भारत में टेक्नोलॉजी के विकास के साथ, बहुत सी चीजों का अपना मूल स्थान या ऑरिजन प्लेस बदल गया और वे चीजें आधुनिकता की ओर मुड़ गई। इस तकनीकी घुसपैठ से कला या आर्ट के विभिन्न रूपों को सबसे कठोर परिणामों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी ही एक कला है कलाई की कला। पुराने जमाने के लोग आज भी कलाईवालों को उन लोगों के रूप में याद करते हैं, जो पीतल और तांबे के बर्तनों को कुशलता से गढ़ते थे। पहले रसोई में तांबे और पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता था लेकिन स्टेनलेस स्टील और एल्यूमीनियम के बर्तनों की तेजी से घुसपैठ के साथ, ये बर्तन आधुनिक रसोई से विलुप्त होते गए।

धातु के बर्तनों का इस्तेमाल शरीर के लिए होता है फायदेमंद
बहुत समय पहले लोग नल या टैब लगे मिक्स धातु या पीतल, तांबो के बर्तनों में पानी जमा करते थे और वास्तव में इनका उपयोग करने के पीछे एक कारण होता है। दिलचस्प बात यह है कि ये धातुएं या मिश्र धातु एक दिव्य चेतना को आकर्षित करते हैं। शरीर को अलग-अलग तरह से फायदे पहुंचाते हैं।
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क्या होता है जब ये धातुएं अपनी चमक और रंगखो देती हैं?

  • जब पीतल और तांबे के बरतन पुराने हो जाते हैं, तो उन्हें छह से आठ महीने के बाद टिन-प्लेटिंग की आवश्यकता होती है और जो व्यक्ति यह पुन: टिनिंग करता है उसे ‘कलाईवाला’ कहा जाता है।
  • पहले इन वेसल ने रसोई पर राज किया, लेकिन अब स्टेनलेस स्टील और एल्यूमीनियम के वेसल के सामने आने के साथ, उन्होंने समाज में कुछ हद तक अपनी उपयोगिता खो दी है और अब अपनी खुद की पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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प्रक्रिया कैसेहोती है?

  • कलाई की प्रक्रिया में पहला कदम तांबे के बर्तन को पहले कास्टिक सोडा से धोना होता है ताकि सतह की अशुद्धियों जैसे धूल से छुटकारा मिल सके।
  • फिर बर्तन को उस एसिड से धोया जाता है जिसमें सोना शुद्ध करने वाला प्यूरिफाइंग कंपाउंड ‘सूफा’, एक नमक और एक अन्य एलिमेंट होता है।
  • इसके बाद, इसे तुरंत साफ कर दिया जाता है अन्यथा इससे निशान बन सकता है। ‘कलाईवाला’ या कलाइगर फिर जमीन में एक गड्ढा खोदते हैं और एक अस्थायी ब्लास्ट फर्नेस तैयार करते हैं, इसे धौंकनी से हवा देते हैं, बाद में बर्तन को गर्म करते हैं।
  • फिर वे ‘नौसादर’ पाउडर (अमोनियम क्लोराइड) नामक एक मिरिकल कंपोनेंट छिड़कता है और फिर एक सूती कपड़े से बर्तन पर रगड़ता है, जिससे गहरा सफेद धुआं और एक अजीबोगरीब अमोनिया की गंध निकलती है।
  • अंत में, इसे पानी से भरी बाल्टी में डुबोया जाता है। पानी के साथ गर्म बर्तन का अचानक संपर्क एक कठोर और तेज आवाज पैदा करता है जो बर्तन के ठंडे होने साथ मंद होता जाता है, अंत में पूरा ठंडा हो जाने पर यह आवाज बंद हो जाती है।



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