Opinion: कैसे झूठ के सहारे खड़ा नफरत भरा कार्यक्रम है ‘वैश्विक हिन्दुत्व का विनाश’

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Opinion: कैसे झूठ के सहारे खड़ा नफरत भरा कार्यक्रम है 'वैश्विक हिन्दुत्व का विनाश'


अभिजीत मजूमदार
नई दिल्‍ली.
समय अधिक विडंबनापूर्ण नहीं हो सकता था. इरादा और अधिक भयावह नहीं हो सकता था. तालिबान ने फिर से अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है. वह सिर्फ वादे और प्रेस कॉन्फ्रेंस के साथ अपने पुराने व बर्बर तरीकों को चमका रहा है. जिस तरह कट्टरपंथी इस्लाम के जिद्दी हिंसक और अपरिवर्तनीय पहलू सामने आ रहे हैं, उसी तरह इसके प्रमुख समर्थक और जाने-माने हिंदुत्ववादी ध्यान भटकाने के लिए सामने आए हैं. उन्हें अब दुनिया के सबसे प्राचीन विश्वास को लक्षित करना चाहिए, जो दर्जनों अन्य लोगों के साथ सह अस्तित्व में है और उन्हें पनाह देता है.

लेकिन जो बात सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वह है नरसंहार पर लीपापोती, हिंदुत्‍ववादी तीन दिनी निंदा जाहिर तौर पर कोलंबिया, प्रिंसटन, बर्कले, हार्वर्ड और यू-पेन जैसे शीर्ष अमेरिकी विश्वविद्यालयों के विभागों द्वारा प्रायोजित की जा रही है.

आक्रामक, नरसंहार की कल्पना ऑनलाइन कार्यक्रम की विवरण पुस्तिका से शुरू होती है. यह दिखाता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के आंकड़े हथौड़े के पीछे से जड़ से उखाड़े जा रहे हैं. आरएसएस यकीनन दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन है और मुल्ला, मिशनरियों और माओवादियों द्वारा भारत के व्यवस्थित सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय अधिग्रहण के खिलाफ एक अहिंसक, जमीनी स्तर पर गढ़ रहा है.

सदियों के नरसंहार इस्लामी आक्रमणों, अशक्‍त ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय उपनिवेशवाद और अल्पसंख्यक वोटबैंक तुष्टीकरण 70 वर्षों के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पहली बार एक सभ्यतागत बदलाव देखा है. मुसलमानों के इस आग्रह पर कि वे हिंदुओं के साथ सह-अस्तित्व में नहीं हो सकते, दो इस्लामिक राज्यों को भारत से अलग कर दिया गया था. तबसे जबकि भारत की मुस्लिम आबादी बढ़ गई है और अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र हो गई है, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग कम हो गई है.

अफगानिस्तान, जो कभी पूरी तरह से हिंदुओं, बौद्धों और सिखों का घर था, वहां 3.8 करोड़ मुसलमानों की आबादी में 700 से भी कम हिंदू और सिख बचे हैं. यहां तक ​​कि मुट्ठी भर लोग भी तबाह हुए देश को छोड़ने के लिए बेताब हैं.

इस पृष्ठभूमि में इन तथाकथित बुद्धिजीवियों, जिनमें से कुछ हिंसक माओवादी विद्रोह का समर्थन करते हैं या सशस्त्र जिहाद के समर्थक हैं, ने विश्व स्तर पर हिंदुओं को लक्षित करने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया है. हिंदुत्व शब्द का हिंदू के विरोध में इस्तेमाल करना चालाकी है. यह हिंदुओं के पीछे जाने के लिए कुत्ते की सीटी बजाने जैसा है.

हिंदुत्व हिंदू होने का सार है. हिंदुत्व को कार्रवाई में हिंदुत्व के रूप में भी वर्णित किया जा सकता है.
हिंदू पहचान के हालिया शांतिपूर्ण और देशभक्तिपूर्ण दावे से भारत को कमजोर करने और अंततः भारत को कमजोर करने की वैश्विक परियोजना के पटरी से उतरने का खतरा है. उसके दोनों पड़ोसियों, चीन और पाकिस्तान की इसमें बड़ी हिस्सेदारी है.

पाकिस्तान अमेरिका में अपने जासूसी नेटवर्क के जरिए तथाकथित धर्मनिरपेक्ष भारतीय बुद्धिजीवियों को लुभा रहा है. कुछ दशक पहले गुलाम फाई नामक एक आईएसआई चैप ने कुछ ऐसे उत्साही भारतीय मीडियाकर्मियों को फंसाया था, जो अमेरिकी सैर और या शायद इससे कुछ अधिक के लिए उत्‍साही थे.

हाल ही में पाकिस्तान ने अमेरिका में इसे आगे बढ़ाया है, जिसे सुरक्षा हलकों में ह्यूस्टन नेटवर्क के रूप में जाना जाता है. भारत के साथ कश्मीर के पूर्ण एकीकरण से आहत पाकिस्तान ने अपनी विशेष स्थिति को अलग करके भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है.

‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ यानी वैश्विक हिंदुत्व को खत्म करने के कार्यक्रम के पीछे के साए में काम कर रहे लोगों का पता लगाना दिलचस्प होगा. इवेंट की विवरण पुस्तिका नए नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को बहिष्कृत करने के बारे में शिकायत के साथ शुरू होता है.

सीएए नैरो-विंडो कानून है, जो तीन पड़ोसी इस्लामी देशों के छह सताए गए धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए नागरिकता को फास्ट ट्रैक करता है. इनमें हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी हैं. इसका आधार इस्लामिक पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न है.

मुसलमान, चाहे वे सुन्नी हों, शिया हों या सूफी, अहमदिया या इस्माइली जैसे छोटे संप्रदाय, तीन मुस्लिम देशों के लिए बने इस विशिष्ट कानून के तहत उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के रूप में नहीं देखे जा सकते. उन्होंने 1947 में भारत से मुक्त होने और अपनी मुस्लिम पहचान के आधार पर नए इस्लामी राष्ट्र का हिस्सा बनने का फैसला किया.

इन देशों के मुसलमानों को अभी भी भारतीय नागरिकों के रूप में प्राकृतिक बनाया जा सकता है. उन्हें पहले से मौजूद नागरिकता कानूनों के तहत आवेदन करने और अर्हता प्राप्त करने की आवश्यकता है, लेकिन सीएए नहीं.

सीएए किसी भी भारतीय मुसलमान को प्रभावित नहीं करता है. यह भारत के इस्लामी पड़ोसियों द्वारा 1950 के नेहरू-लियाकत समझौते के अधूरे वादों और इसके बर्बर परिणामों को संबोधित करने का प्रयास करता है.
संधि में कहा गया है कि शरणार्थियों को उनकी संपत्ति के निपटान के लिए बिना छेड़छाड़ के लौटने की अनुमति दी गई थी. अपहृत महिलाओं और लूटी गई संपत्ति को वापस किया जाना था. जबरन धर्मांतरण को मान्यता नहीं दी जानी थी और अल्पसंख्यक अधिकारों की पुष्टि की. भारत ने अपनी बात रखी. इसके तीन इस्लामी पड़ोसियों ने अल्पसंख्यकों के निर्मम बलात्कार, हत्या, धर्मांतरण, भूमि हड़पने और कानूनी भेदभाव की अनुमति दी, जब तक कि उनकी संख्या एक कण तक कम नहीं हो गई.

इसके बाद विवरण पुस्तिका सकारात्मक रूप से विचित्र हो जाती है. यह विमुद्रीकरण और कृषि कानूनों के बारे में है. इन आर्थिक नीतियों की प्रभावशीलता पर कोई बहस कर सकता है, लेकिन हिंदुत्व का इससे क्या लेना-देना है?

ऐसा लगता है कि एजेंडा रखने वाले लोगों के एक समूह ने हिंदुओं को निशाना बनाने का मन बना लिया है, लेकिन उन्हें पीटने के लिए लाठियों से भागते रहते हैं. स्वराज्य पत्रिका में अपने हालिया अंश में आर जगन्नाथन ने ठीक ही पूछा है कि क्या अमेरिकी विश्वविद्यालय, जो खुद को स्वतंत्र भाषण के समर्थक के रूप में पेश करते हैं, इस्लाम या इंजील ईसाई धर्म को खत्म करने के लिए कार्यक्रमों को प्रायोजित करेंगे. ऐसी संभावना नहीं है. शायद दोष हिन्दुओं का है. उन्होंने खुद को इस हद तक एक आसान लक्ष्य बना लिया है कि कोई भी उन्हें रौंद सकता है, हर समय पवित्र लग रहा है.

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