सोमनाथ को लेकर सरदार के सपने को नई ऊंचाई दे रहे हैं पीएम मोदी!

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सोमनाथ को लेकर सरदार के सपने को नई ऊंचाई दे रहे हैं पीएम मोदी!


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार की सुबह ग्यारह बजे सोमनाथ से जुड़ी तीन परियोजनाओं का लोकार्पण करने जा रहे हैं. इसके साथ ही वो पार्वती माता मंदिर के लिए शिलान्यास भी करेंगे. कोरोना के दौर में ये सारा कुछ ऑनलाइन होगा, वर्चुअल स्वरूप में. इस कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह भी जुड़ेंगे. हालांकि मोदी और शाह इस दौरान दोहरी भूमिका में होंगे. मोदी देश के प्रधानमंत्री के साथ ही सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष की भूमिका में, तो अमित शाह गृह मंत्री के साथ ही सोमनाथ ट्रस्ट के सदस्य के तौर पर.

मोदी करेंगे समुद्र दर्शन पथ का लोकार्पण

पीएम मोदी जिन तीन परियोजनाओं का लोकार्पण करने वाले हैं, उनमें सबसे खास है वो प्रोमनेड, जिसे समुद्र दर्शन पथ का नाम दिया गया है. करीब 47 करोड़ रुपये की लागत से इस प्रोमनेड का निर्माण किया गया है, जिसके लिए धन, केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय की तीर्थ यात्रा कायाकल्प और आध्यात्मिक विरासत मुहिम, जो ‘प्रसाद’ योजना के तौर पर मशहूर है, से दिया गया है. करीब डेढ़ किलोमीटर लंबे और सत्ताइस फीट चौड़े इस समुद्र दर्शन पथ के साथ जो दीवार खड़ी की गई है, उस पर भगवान शिव के जीवन से जुड़े आकर्षक चित्र बनाये गये हैं, जो शिव पुराण पर आधारित हैं. इस पथ पर टहलते हुए न सिर्फ पर्यटक सागर की लहरों को निहार सकते हैं, बल्कि सोमनाथ मंदिर की भव्यता का भी अहसास कर सकते हैं. इस समुद्र दर्शन पथ पर छोटे बच्चे साइकिल भी चला सकते हैं या फिर वो गेम खेल सकते हैं, जिसे इस पथ की फर्श पर ही तैयार किया गया है.

सोमनाथ में बना है भव्य प्रदर्शनी कक्ष भी

प्रोमनेड के अलावा पीएम मोदी उस प्रदर्शनी कक्ष का भी लोकार्पण करने वाले हैं, जिसमें उन मूर्तियों और सामग्रियों को रखा गया है, जो सोमनाथ के मंदिर के निर्माण के समय खुदाई से निकली थीं. भूमि के अंदर से एक के बाद एक तीन पुराने मंदिरों के अवशेष बरामद हुए थे. इनमें से ज्यादातर सोमनाथ के सरकारी संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे हैं, लेकिन जो सामग्री सोमनाथ मंदिर प्रांगण में रह गई थी, उसी को इस प्रदर्शनी कक्ष में सजाकर रखा गया है. साथ में इस कक्ष में जानकारी दी गई है सोमनाथ मंदिर के इतिहास, वास्तुशिल्प और धार्मिक महत्व और विधि-विधान की. नागर शैली के इस मंदिर के शिल्प की बारीकियां भी बताई गई हैं.

केंद्र की प्रसाद योजना के तहत हो रहे हैं सोमनाथ में विकास कार्य

प्रदर्शनी कक्ष, जिसे सोमनाथ एक्जिहिबिशन गैलरी का नाम दिया गया है, वो केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के प्रसाद फेज-1 परियोजना का हिस्सा है, जिसके तहत प्रदर्शनी कक्ष के निर्माण के अलावा पार्किंग और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की भी व्यवस्था की गई है. करीब पैंतालीस करोड़ रुपये की लागत से इस परियोजना को पूरा किया गया है. समुद्र दर्शन पथ के साथ ही प्रदर्शनी कक्ष का निर्माण सोमनाथ आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण के नये केंद्र बनने वाले हैं, जो देश-विदेश से बड़े पैमाने पर साल भर सोमनाथ महादेव का दर्शन करने आते हैं, जिनको बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान हासिल है.

अहिल्याबाई मंदिर परिसर का भी हुआ है जीर्णोद्धार

प्रोमनेड और प्रदर्शनी कक्ष के साथ ही पीएम मोदी शुक्रवार के दिन जूना सोमनाथ मंदिर के नाम से मशहूर उस मंदिर के परिसर के पुनर्निर्माण के तहत बनाई गई संरचना का भी लोकार्पण करने वाले हैं, जिसका निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1783 से 1787 के बीच कराया था. सोमनाथ का मौजूदा भव्य मंदिर जो सरदार पटेल की प्रेरणा से निर्मित हुआ, उसके पहले अहिल्याबाई के बनाये हुए मंदिर में ही भक्त भगवान शंकर की आराधना करने जाते थे सोमनाथ की यात्रा के दौरान. अहिल्याबाई निर्मित इस मंदिर के परिसर का पुनर्निर्माण सोमनाथ ट्रस्ट ने अपने कोष से साढ़े तीन करोड़ रुपये में कराया है, इस पर कोई सरकारी धन खर्च नहीं किया गया है.

अहिल्याबाई निर्मित मंदिर में बनी थी सोमनाथ के भव्य मंदिर की योजना

सुखद संयोग ही है कि जो सोमनाथ ट्रस्ट आज अपने फंड से अहिल्याबाई निर्मित जूना सोमनाथ मंदिर के परिसर को ठीक करा चुका है, उसी अहिल्याबाई मंदिर के परिसर में खड़े होकर 13 नवंबर 1947 के दिन सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर की असली जगह पर भव्य सोमनाथ मंदिर बनाने के लिए अपने साथियों के साथ विचार-विमर्श किया था और फिर इसके लिए संकल्प लिया था. विक्रम संवत 2004 के नूतन वर्ष के प्रथम दिन सरदार पटेल ने जो संकल्प लिया, सोमनाथ के मंदिर को उसका पुराना भव्य स्वरूप देने का सपना देखा, उसी सपने को मूर्त स्वरुप देने का काम कर रहे हैं पीएम मोदी सोमनाथ ट्रस्ट के वर्तमान अध्यक्ष के तौर पर. ये भी संयोग ही है कि खुद मोदी को क्रेडिट जाता है दुनिया की सबसे उंची प्रतिमा के तौर पर सरदार पटेल की प्रतिमा को रिकॉर्ड समय में गुजरात के केवडिया में तैयार करवाने का, जो परियोजना पूरी दुनिया में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के तौर पर प्रसिद्धि बटोर रही है.

पार्वती मंदिर के निर्माण पर करीब 30 करोड़ रुपये खर्च होंगे.

पार्वती मंदिर के निर्माण पर करीब 30 करोड़ रुपये खर्च होंगे.

शिव भक्त मोदी के हाथों होगा पार्वती मंदिर का शिलान्यास

सरदार पटेल की प्रेरणा से बना भव्य सोमनाथ मंदिर तो अरब सागर के किनारे पिछले सात दशक से सनातन धर्म की कीर्ति पताका फहरा रहा है लेकिन पार्वती मंदिर की कमी रह गई थी. पीएम मोदी अब उस कमी को भी पूरा करने जा रहे हैं, आखिर वो खुद भगवान शंकर के बड़े भक्त हैं, पार्वती के बिना शिव की कल्पना कैसे की जा सकती है. इसलिए शुक्रवार के दिन वो पार्वती मंदिर का शिलान्यास भी करने जा रहे हैं. इस पार्वती मंदिर के निर्माण पर करीब तीस करोड़ रुपये खर्च होंगे. इस मंदिर का निर्माण भी निजी दान से होना है, इसके लिए सरकारी धन का इस्तेमाल नहीं होगा.

सोमनाथ में पर्यटन सुविधाओं के विकास पर है जोरसरकारी धन का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ सोमनाथ मंदिर के आसपास आधारभूत सुविधाएं विकसित करने के लिए किया जा रहा है, जिससे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है और यहां आने वाले लोगों की तादाद बढ़ सकती है. सोमनाथ जैसे प्रसिद्ध स्थलों पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में इजाफा हो, इसी सोच के तहत पर्यटन मंत्रालय ने आइकोनिक डेस्टिनेशन डेवलपमेंट स्कीम तैयार की है, जिसे जल्दी ही मोदी कैबिनेट की मंजूरी मिल सकती है. अगर ऐसा होता है तो सोमनाथ में 111 करोड़ रुपये की परियोजना इस स्कीम के तहत लागू की जाएगी. इसके तहत सोमनाथ के नये मास्टर प्लान को ध्यान में रखते हुए नई जगह पर शॉपिंग कॉम्पलेक्स का निर्माण, हेरिटेज वाक का निर्माण, म्यूजियम का नये सिरे से निर्माण, गीता मंदिर और त्रिवेणी संगम के पास रिवरफ्रंट का निर्माण, स्थानीय हस्तशिल्प और खान-पान को बढ़ावा देने के लिए इको-विलेज और हाट का निर्माण शामिल है.

282 करोड़ रुपये का है सोमनाथ के विकास का मास्टर प्लान

वैसे सोमनाथ का संशोधित मास्टर प्लान करीब 282 करोड़ रुपये का है, जिसमें से 111 करोड़ रुपये तो पर्यटन मंत्रालय के आइकोनिक डेस्टिनेशन डेवलपमेंट स्कीम से हासिल होंगे, बाकी 171 करोड़ रुपये केंद्र और राज्य सरकार की एजेंसियों के साथ ही सोमनाथ ट्रस्ट की तरफ से खर्च किये जाएंगे. इसके तहत केशोद एयरपोर्ट से हवाई सेवा शुरु करने के साथ ही सी- प्लेन, क्रुज, फेरी और बोट सर्विस की व्यवस्था शामिल है, साथ में सोमनाथ मंदिर की चाहरदीवारी और पूरे परिसर और शहर की बेहतर लाइटिंग और साज-सज्जा भी शामिल है.

प्रसाद के दूसरे चरण में खर्च होंगे 40 करोड़ रुपये

यही नहीं पर्यटन मंत्रालय के प्रसाद फेज-2 परियोजना के तहत चालीस करोड़ रुपये और खर्च किये जाएंगे इसके जरिये पब्लिक प्लाजा का निर्माण होगा, जिसमें दर्शनार्थियों के लिए आराम से दर्शन करने के लिए पंक्ति लगाने की सुविधा के साथ ही दिव्यांगों के लिए प्लाजा के नजदीक ही पार्किंग की व्यवस्था भी होगी. ये सभी परियोजनाएं अगले दो-तीन वर्ष में पूरी होनी हैं. अगर सोमनाथ के संशोधित मास्टर प्लान के तहत ये सारी योजनाएं लागू हो जाती हैं, तो दो-तीन वर्षों बाद कोई भी पर्यटक या श्रद्धालु हवाई, रेल या सड़क मार्ग से फटाफट सोमनाथ पहुंच सकता है, यहां पर भगवान सोमनाथ का आराम से दर्शन कर सकता है, रुक सकता है, बच्चे से लेकर बूढ़े तक समंदर के किनारों का लुत्फ उठा सकते हैं और यहां तक कि अरब सागर में क्रूज का आनंद भी ले सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो सोमनाथ देश के अंदर पर्यटकों के बड़े केंद्र के तौर पर फिर से उभर कर आ जाएगा, जैसा प्राचीन काल में था और जिसकी भव्यता और समृद्धि के किस्से सुनकर ही कबाइली मानसिकता वाले जेहादी लुटेरे और इस्लामी आक्रमणकारी यहां जल-भुनकर पहुंचे और एक तरफ जहां मंदिर को तोड़ा-फोड़ा तो दूसरी तरफ यहां रखे गये सोना-जवाहरात लूटकर ले गये.

राजेंद्र बाबू के हाथों हुई थी सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा

अपने हजारों वर्ष लंबे इतिहास में सोमनाथ का मंदिर कई बार विदेशी आक्रांताओं और कट्टर मुस्लिम-जेहादी शासकों के हाथों खंडित हुआ है, लेकिन ये हर बार भारतीय हिंदू समाज की सामूहिक ताकत के बल पर उठ खड़ा हुआ. गुजरात के प्रभास पाटण में भगवान शंकर का जो भव्य मंदिर सोमनाथ मंदिर के तौर पर देश-दुनिया में मशहूर है, उसकी प्राण प्रतिष्ठा देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के हाथों 11 मई, 1951 को हुई थी

आधे दर्जन से भी अधिक दफा किया आक्रमणकारियों ने विध्वंस

इस मंदिर ने उसी जगह आकार लिया था, जहां पहले बने मंदिरों को अलग-अलग कालखंड में महमूद गजनी, अलाउद्दीन खिलजी, महमूद तुगलक, जफर खान उर्फ मुजफ्फर शाह, महमूद बेगड़ा और औरंगजेब ने तहस-नहस और अपवित्र किया था. एक बार सोमनाथ मंदिर को पुर्तगाली सेनापति डीकास्टो ने भी नुकसान पहुंचाया था, जिस पुर्तगाल के सम्राट को पोप ने भारत सहित पूरे अरब-एशिया में ईसाई धर्म के प्रचार और लोगों का इस संप्रदाय के अंदर धर्मांतरण करने का जिम्मा दिया था.

सरदार की प्रेरणा से हुआ सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण

लेकिन भारत ने स्वतंत्रता हासिल करने के साथ ही सोमनाथ के पुराने गौरव को फिर से हासिल करने का मन बनाया और इसके लिए प्रेरणा पुरुष साबित हुए सरदार पटेल. 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र  हुआ, तो ब्रिटिश सरकार ने अपने सीधे नियंत्रण वाले प्रांतो को तो भारत और पाकिस्तान के बीच धार्मिक आधार पर बांट दिया, लेकिन 562 देसी रियासतों को आजाद कर दिया भारत या पाकिस्तान में किसी के साथ भी जुड़ जाने के लिए.

सोमनाथ को पाकिस्तान की गोद में डालने की कोशिश की थी मुस्लिम नवाब ने

ऐसे में अपने कट्टर मुस्लिम लीगी दीवान शाहनवाज भुट्टो की सलाह पर जूनागढ़ रियासत के तत्कालीन नवाब महाबत खान तृतीय ने अपनी रियासत का विलय भारत की जगह पाकिस्तान में करने का फैसला किया, वो भी तब जबकि जूनागढ़ की अस्सी फीसदी जनता हिंदू थी और उसी जूनागढ़ रियासत का हिस्सा हुआ करता था प्रभास पाटण इलाका, जिसमें था भगवान सोमनाथ का मंदिर, जीर्ण-शीर्ण, भग्न हालत में.

जूनागढ़ के नवाब के फैसले के खिलाफ यहां की जनता ने आंदोलन शुरु कर दिया, शामलदास गांधी की अगुआई में जन प्रतिनिधियों की सरकार बनाई गई, आंदोलन शुरू हुआ और नवाब जूनागढ़ छोड़कर पाकिस्तान भाग खड़ा हुआ और उसी शाहनवाज भुट्टो ने, जिसने नवाब को पाकिस्तान में विलय के लिए उकसाया था, जूनागढ़ के बदले हालात के मद्देनजर उसका कब्जा लेने का अनुरोध भारत सरकार से किया.

13 नवंबर 1947 को सरदार ने सोमनाथ को लेकर किया था संकल्प

9 नवंबर 1947 को भारतीय फौज ने जूनागढ़ का नियंत्रण अपने हाथ में लिया, तीन दिन बाद 12 नवंबर को सरदार पटेल जूनागढ पहुंचे और उसके अगले दिन यानी 13 नवंबर को प्रभास पाटण. वहां का भग्न मंदिर देखकर उनका दिल रो पड़ा. समंदर से एक अंजली पानी लेकर सरदार ने सोमनाथ के मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया. अहिल्याबाई निर्मित मंदिर के प्रांगण में ही इस पर चर्चा शुरु हुई. सरदार की बात से वहां मौजूद तमाम लोग सहमत हुए, जिसमें जूनागढ़ की अंतरिम सरकार, आरजी हुकूमत के अगुआ शामलदास गांधी, नवानगर रियासत के शासक जामसाहब दिग्विजय सिंहजी और केंद्रीय मंत्रिमंडल में सरदार के सहयोगी वीएन गाडगिल थे. जामसाहब ने अपनी तरफ से एक लाख रुपये का दान देने की तत्काल घोषणा की, शामलदास गांधी ने भी जूनागढ़ की अंतरिम सरकार की तरफ से इक्यावन हजार रुपये देने की घोषणा की और इसी के साथ मंदिर निर्माण की योजना आगे बढ़ी.

नेहरू और मौलाना आजाद नहीं थे सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के हक में

भारत की सनातन संस्कृति के बड़े प्रतीक और विदेशी आक्रांताओं के आगे घुटने न टेकने और शून्य से बार-बार सर्जन की तरफ बढ़ने की प्रवृति के तौर पर मंदिर का पुनर्निर्माण भारत सरकार की तरफ से करने का फैसला कैबिनेट में लिया गया, क्योंकि इससे पहले कई मस्जिदों और चर्चों की मरम्मत भी सरकारी खर्चे पर की जा चुकी थी. लेकिन महात्मा गांधी की सलाह पर सरदार पटेल ने सोमनाथ ट्रस्ट के जरिये सार्वजनिक दान हासिल कर इसका निर्माण कराने का फैसला किया, न कि सरकारी धन से. वैसे भी जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद इसको लेकर पहले से ही नाक भौं सिकोड़ रहे थे. जहां नेहरू इसे संकीर्ण हिंदुत्व को पुनर्जीवित करने की कोशिश के तौर पर देख रहे थे, तो आजाद जैसे लोगों को पुराने मंदिर के भग्नावशेष को ही सहेज कर हेरिटेज के तौर पर रखने की इच्छा थी. लेकिन सरदार तो सरदार थे, भग्नावशेष सोमनाथ का मंदिर भारत की बहुसंख्यक हिंदू आबादी के लिए हजारों वर्ष के संघर्ष के बाद आजाद होने के बावजूद नासूर की तरह लगता, इसका उन्हें अंदाजा था.

1950 में शुरु हुआ मंदिर निर्माण कार्य

सरदार की दृढता के कारण ही पुराने मलबे को हटाकर नये सिरे से मंदिर बनाने की बात आगे बढ़ी. 23 जनवरी 1949 को सोमनाथ ट्रस्ट बनाने का औपचारिक फैसला किया गया और सरदार की हरी झंडी के बाद 15 मार्च 1950 के दिन से सोमनाथ ट्रस्ट ने विधिवत तौर पर अपना काम शुरु कर दिया. ट्रस्ट के पहले अध्यक्ष बने जामसाहब दिग्विजय सिंहजी, जो तब तक काठियावाड़ की तमाम देसी रियासतों को मिलाकर बने सौराष्ट्र राज्य के भी राजप्रमुख बनाये जा चुके थे. इस नये राज्य की प्रेरणा भी उसी 13 नवंबर 1947 की सोमनाथ की बैठक से मिली थी, जब सरदार ने सोमनाथ मंदिर का नये सिरे से निर्माण करने का फैसला किया था.

ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा के पहले ही सरदार ने त्यागे प्राण

सोमनाथ ट्रस्ट के अस्तित्व में आने के बाद 19 अप्रैल 1950 के दिन सौराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री उछ्रंगराय ढेबर के हाथों मंदिर के लिए भूमिखनन का कार्य शुरु हुआ और 4 मई 1950 को सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष जामसाहब दिग्विजयसिंह के हाथों शिलान्यास. लेकिन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की प्राणप्रतिष्ठा हो पाती, उससे पहले ही 15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल का मुंबई में देहांत हो गया.

सरदार के देहांत के बाद नेहरू का सोमनाथ विरोध और मुखर हुआ

सरदार के देहांत के साथ ही सोमनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर जवाहरलाल नेहरू का विरोध खुलकर सामने आ गया. सोमनाथ मंदिर के निर्माण से जुड़े अपने दोनों कैबिनेट सहयोगियों केएम मुंशी और एनवी गाडगिल पर उन्होंने निशाना साधना शुरु कर दिया. वो और कुपित हो गये, जब उन्हें पता चला कि मुंशी के निमंत्रण पर राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद 11 मई 1951 को सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में बतौर यजमान शामिल होने जा रहे हैं. हद तो ये हो गई कि नेहरू ने अपने दोनों सहयोगियों पर ये आरोप लगाया कि बिना कैबिनेट में चर्चा किये सोमनाथ मंदिर के निर्माण का काम शुरु किया गया है.

नेहरू ने प्रथम राष्ट्रपति प्रसाद को भी सोमनाथ से किनारा करने को कहा था

एनवी गाडगिल को नेहरू के आरोपों की हवा निकालने के लिए कैबिनेट रिपोर्ट्स को सामने रखना पड़ा, जिसमें इस विषय पर पहले चर्चा हो चुकी थी और कैबिनेट की सहमति भी हासिल की जा चुकी थी. जगजीवन राम जैसे मंत्री ने भी गाडगिल की बात का समर्थन किया. गाडगिल ने इस घटना का जिक्र अपनी पुस्तक ‘Government from Inside’ में विस्तार से किया है. नेहरू को इस बात से भी बड़ा एतराज था कि प्राण प्रतिष्ठा के कार्य के लिए पूरी दुनिया से नदियों-समुद्रों का जल, मिट्टी और टहनियां क्यों मंगाई जा रही हैं, वो भी भारतीय दूतावासों का इस्तेमाल करते हुए. यही नहीं, नेहरू ने राजेंद्र बाबू को भी प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में जाने से रोकने की कोशिश की. लेकिन न तो मुंशी और न ही राजेंद्र बाबू टस से मस हुए. नेहरू की नाराजगी की परवाह न करते हुए, दोनों प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में शामिल हुए, यहां तक कि इस तैयारी के साथ कि अगर पद छोड़ना पड़े तो पद छोड़ देंगे, लेकिन भारत के गौरवशाली अतीत और जीवट के इस बड़े प्रतीक चिन्ह को फिर से संजोने के कार्यक्रम से पीछे नहीं हटेंगे. नेहरू इतने नाराज हुए कि देश के प्रथम पुरुष और राष्ट्रपति के नाते संवैधानिक प्रमुख के तौर पर राजेंद्र बाबू की सोमनाथ यात्रा की प्रेस विज्ञप्ति तक पीआईबी के जरिये जारी नहीं होने दी.

देश की बदली राजनीति की झलक दे रहा है खुद सोमनाथ मंदिर

एक वो दौर, और अब आज का दौर. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा के सात दशक बाद देश के सियासी हालात किस तरह से बदल चुके हैं, इसका अंदाजा खुद सोमनाथ के संदर्भ में केंद्र सरकार के रवैये से साफ हो जाता है. देश के प्रथम पीएम नेहरू ने जहां सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को अंदर से पसंद नहीं किया, राह में हर किस्म के रोड़े लगाये, वही आज देश के पीएम की कुर्सी पर वो शख्स बैठा है, जो न सिर्फ लंबे समय से सोमनाथ ट्रस्ट का सदस्य रहा है, बल्कि इस साल की जनवरी से खुद ट्रस्ट का अध्यक्ष भी है. नेहरू के उलट नरेंद्र मोदी की हिंदू, सनातन संस्कृति में गहरी आस्था रही है और सोमनाथ से तो लंबा नाता. यही हाल अमित शाह का भी है, जो देश के गृह मंत्री ही नहीं, सोमनाथ ट्रस्ट के ट्रस्टी भी हैं. देश के प्रथम गृह मंत्री के तौर पर सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के फिर से निर्माण की राह में आने वाली सभी बाधाओं को दूर किया था, वही आज अमित शाह नरेंद्र मोदी का भरपूर साथ दे रहे हैं सोमनाथ को उसका पुराना गौरव हासिल करने में, प्रभास पाटण इलाके की भव्यता को बहाल करने में.

मोदी और शाह हैं शिवभक्त, सोमनाथ ट्रस्ट में हैं शामिल

मोदी की वैसे भी भोले-भंडारी में गहरी आस्था है. बचपन से ही अपने जन्मस्थान वडनगर के शिव मंदिर में जाते रहे और जब कैलाश-मानसरोवर की यात्रा शुरु हुई, तो इसके शुरुआती बैच में 1989 में कैलाश दर्शन कर आए. सोमनाथ के मंदिर में संघ प्रचारक दिनों से आना-जाना लगा रहा. यहां तक कि मोदी ने जब रथयात्रा के जरिये जनसमूह को जोड़ने की राजनीति को पुख्ता कर लिया गुजरात में तमाम प्रयोगों के साथ, तो अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए भी तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा की शुरुआत के लिए सोमनाथ का ही चुनाव किया, ताकि यहां से निकलने वाली यात्रा देश भर में लोगों को राम मंदिर निर्माण के लिए प्रेरित कर सके, वैसे ही जैसे सोमनाथ का पुनर्निर्माण जनभागीदारी से हुआ. दोनों में साम्यता भी थी, दोनों ही जगहों पर मंदिरों को ध्वस्त करने का काम धर्मांध मुस्लिम शासकों और आक्रांताओं ने किया था.

सोमनाथ के साथ अयोध्या में भी बड़ी भूमिका निभाई मोदी ने

सोमनाथ से 1990 में निकली आडवाणी की रथयात्रा की पूरी प्लानिंग खुद मोदी ने की थी. राम रथ यात्रा अयोध्या पहुंचती, उससे पहले ही समस्तीपुर में बिहार के तत्कालीन सीएम लालू यादव ने आडवाणी की रथयात्रा को रोक दिया. लेकिन राम मंदिर के निर्माण का ज्वार थमा नहीं. साल भर बाद खुद मोदी तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के साथ एकता यात्रा के तहत अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए गये थे और शायद मन में संकल्प भी किया था कि यहां दोबारा तभी आउंगा जब राम मंदिर निर्माण का काम शुरु होगा. हुआ भी वही, और संयोग ये कि खुद मोदी को बतौर पीएम अयोध्या में राम मंदिर के लिए भूमिपूजन का सौभाग्य हासिल हुआ पिछले साल मई में, राम जन्मभूमि को लेकर हुई दशकों पुरानी कानूनी लड़ाई का समाधान हो जाने के बाद.

सीएम से पीएम तक, मोदी लगातार करते रहे सोमनाथ का विकास

प्रभु श्री राम के जन्मस्थल पर मंदिर निर्माण का काम पुरजोश चल रहा है, उधर सोमनाथ में विकास की गति तेज है. मोदी ने बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री अपने पौने तेरह साल लंबे कार्यकाल के दौरान सोमनाथ के विकास को गति दी और इसी दौरान सोमनाथ ट्रस्ट के ट्रस्टी भी बने. एक समय था जब सोमनाथ और अयोध्या पर बात करना भी देश के पहले पीएम को मंजूर नहीं था, आज हालात ये हैं कि सात साल से देश के पीएम की कुर्सी संभाल रहे मोदी दोनों ही ऐतिहासिक स्थलों को उनका पुराना गौरव दिलाने की हर संभव कोशिश करने में लगे हैं. पिछले सात दशक में राष्ट्रीय राजनीति छद्म धर्मनिरपेक्षता के चंगुल से बाहर निकलकर भारत की मूल प्रवृति और संस्कृति के साथ जुड़ने की ओर आगे बढ़ चली है, यही संकेत है सोमनाथ का, अयोध्या का. कभी जूनागढ़ का कब्जा भारत को हासिल होने पर सरदार पटेल ने जय सोमनाथ का जयघोष किया था, आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह जय सोमनाथ ही नहीं, जय श्रीराम के नारे के साथ भारतीय राजनीति पर अपनी पकड़ को लगातार मजबूत कर रहे हैं, दशा और दिशा तय कर रहे हैं.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)





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