Quit India Movement: भारत ज्ञान का भंडार, संस्कृतियों का अध्ययन करने दुनिया यहां आएगी: आरिफ मोहम्मद खान

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Quit India Movement: भारत ज्ञान का भंडार, संस्कृतियों का अध्ययन करने दुनिया यहां आएगी: आरिफ मोहम्मद खान


नई दिल्ली. अंग्रेज़ों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) की 79वीं वर्षगांठ पर दिल्ली एवं कोटा विश्वविद्यालय व नगर निगम में पदाधिकारी रहे सामाजिक कार्यकर्ता जगदीश ममगाँई द्वारा लिखित पुस्तक ‘लहू से लिखी आज़ादी’ का विमोचन प्रेस क्लब ऑफ इंडिया दिल्ली में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान (Kerala Governor Arif Mohammad Khan) द्वारा किया गया. इस अवसर पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष उमाकांत लखेड़ा, अमर उजाला के संपादक विनोद अग्निहोत्री, नेशनल जर्नलिस्ट एसोशिएसन के अध्यक्ष रास बिहारी सहित कई पत्रकार, शिक्षाविद्, अधिवक्ता व सामाजिक कार्यकर्त्ता उपस्थित थे.

मुख्य अतिथि आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि आजादी के लिए लड़ने वालों ने जिस भारत का सपना देखा, उसको हमको पूरा कर पाएं तो तभी वास्तविक आजादी मानी जाएगी. जिनकी वजह से हम आजादी के फल खा रहे हैं, आजादी के बाद उन्हें दुर्दिन देखने पड़े, जो कौम भुला देती हैं तारीख को अपनी, तो अपने भूगोल को कैसे बचा पाएंगी? अपमान और प्रताड़ना से मुक्ति की इच्छा 1857 की क्रांति ने पैदा की, जो बाद में क्रांति आंदोलन की धारा के रुप में उभरी.

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खान ने कहा कि भारतीय संस्कृति समन्वय की संस्कृति है, समन्वय की संस्कृति ही भारतीय समाज को सशक्त बनाती है. धर्मनिरपेक्षता, धर्म विरोधी भावना नहीं. विभिन्नता में एकात्मता है, हमारी एकता का आधार संस्कृति है. जो सनातन मूल्य हैं, सनातन आदर्श हैं,  वह कभी अप्रासंगिक नहीं होने वाले, समाप्त नहीं होने वाले, बुनियाद सनातन आदर्श की नींव से ही सकारात्मक परिवर्तन आएंगे.

जगदीश ममगाँई द्वारा लिखित पुस्तक ‘लहू से लिखी आज़ादी’ का विमोचन केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान द्वारा किया गया.

भारत ऐसा देश बनेगा जब विश्व के देश विभिन्न संस्कृतियों का अध्ययन करने के लिए भारत आएंगे, भारत ज्ञान का भंडार है. हम अपनी विरासत को जिंदा करेंगे, तो भविष्य स्वयं ही अच्छा होता चला जाएगा.

लेखक जगदीश ममगाँई ने कहा कि आगामी 15 अगस्त को अखण्ड भारत यानि भारत, पाकिस्तान व बंग्लादेश की संयुक्त इकाई, अंग्रेज़ों के औपनिवेशिक शासन से अपनी आज़ादी के 75वें वर्ष (हीरक जयंती) में प्रवेश कर रहे हैं. लेकिन उल्लास की इस घड़ी में हम सैकड़ों साल की गुलामी की तंग अंधेरी गलियों से निकल कर अपने मुस्तबिल को रोशन करने के लिए, आज़ादी के महायुद्ध के सच्चे नायक, जिन्होंने अपना जीवन राष्ट्र की बलिवेदी पर समर्पित कर, हमें ये दिन देखने और खुशी मनाने का अवसर दिया, उन्हें भुला नहीं सकते हैं.

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कहाँ तो कहते थे कि शहीदों की चिताओं पर हर बरस लगेंगे मेले, जश्ने-आज़ादी में ऐसे खोये कि उनका नाम लेने वाला भी नज़र नहीं आया. क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों व आज़ादी के संघर्ष की दास्तां जो हम पर अपनी भावी पीढ़ी के साथ सांझी करने की जिम्मेदारी थी, और है, उसे वर्तमान पीढ़ी आंशिक जानकारी ही प्राप्त कर पाई, वह भी जो शासन व सरकार द्वारा पाठ्य पुस्तकों में सम्मलित की गई है, तो भावी पीढ़ी संपूर्ण संघर्ष को कहां से जान पाएगी.

देश को मिली इस आज़ादी के लिए संघर्षरत कर्मयोगियों की संख्या लाखों में है. लेकिन उनके कृत्यों को जानना तो दूर, अधिकतर का तो नाम तक नहीं पता हैं, लाखों अनाम रह गए. दुर्भाग्य देखिए, भारतीय क्रांतिकारियों की नृशंस हत्या तथा निर्दोष भारतीयों विशेषकर महिलाओं व बच्चों का नरसंहार करने वाले लगभग 150 से 200 ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों की भारत में कब्रगाह बना संरक्षण करने में आज भी भारी धनराशि खर्च कर संरक्षण किया जा रहा है जबकि लाखों शहीद भारतीय क्रांतिकारी व सैनिकों का तो देश नाम भी नहीं जानता. गुलामी के दौर की विशेषकर औपनिवेशिक दौर की घटनाओं को पुनःस्मरण करने की एक छोटी सी कोशिश के रुप में पुस्तक, ‘लहू से लिखी आज़ादी’ का लेखन किया गया है.

ममगाँई ने कहा कि स्वतंत्रता के उपरान्त शासक कांग्रेस ने अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए खुद को भारत की स्वतंत्रता का श्रेय दिलाने का एकाधिकार स्थापित करने के लिए अपने ही नेताओं को स्वतन्त्रता सेनानी के रुप में प्रस्तुत किया. ब्रिटिश राज़ से मुक्ति दिलाने का श्रेय, क्या अंग्रेज़ शासन का प्रतिकार करते हुए हजारों क्रांतिकारियों के सशस्त्र संघर्ष व अनगिनत स्वतन्त्रता सेनानियों द्वारा अपने जीवन के बलिदान, भारत को स्वतन्त्र कराने के निमित्त लाखों लोगों के संघर्ष, दो-तीन लाख लोगों की शहादत को नहीं रहा.

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ऐसे में स्वतन्त्रता प्राप्त करने का संपूर्ण श्रेय गांधी के सत्याग्रह व अहिंसा को देना क्या न्यायोचित है. क्या क्रांतिकारियों के आक्रमक तेवर व ब्रिटिश शासकाधिकारियों पर विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे हमले, घेराबंदी व जन बगावत के कारण ब्रिटिश के मन में घर कर गए, डर का कोई असर नहीं हुआ? क्या नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की कमान में आज़ाद हिन्द फौज़ का सैन्य अभियान और हजारों का युद्ध में मरना व ब्रिटिश सेना को मारने का कोई दबाब ब्रिटिश अधिकारियों पर नहीं बना. फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी की हुई हड़ताल को मिले व्यापक जनसमर्थन व भारतीय जलसेना एवं थलसेना के सैनिकों के मन में, ब्रिटिश शासकों के प्रति घृणा व विरोध का क्या ब्रिटिश शासन पर कोई असर नहीं हुआ.

समाज में ठुकराई हुई तवायफों व डाकुओं ने भी समर में योगदान किया
भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में समाज का हर तबका, छात्र, सैनिक, आदिवासी, मजदूर, शिक्षक, वकील, सन्यासी आदि शामिल हुए. यहां तक की समाज में ठुकराई हुई तवायफों व डाकुओं ने भी इस समर में योगदान किया. ऐसे में सांकेतिक आंदोलन करने व वापस लेने वाली कांग्रेस को क्या शहादत देने वाले शहीदों पर तरजीह प्रदान की जा सकती थी? क्या भारत की भावी पीढ़ी को कांग्रेस प्रायोजित इतिहास की रोशनी में ही स्वतन्त्रता आंदोलन को स्वीकारना होगा?

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