जाति आधारित जनगणना क्यों नहीं कराना चाहती भारतीय जनता पार्टी? यहां है जवाब

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जाति आधारित जनगणना क्यों नहीं कराना चाहती भारतीय जनता पार्टी? यहां है जवाब


संजय कुमार
भाजपा न केवल ओबीसी मतदाताओं के बीच पैठ बनाने में सफल रही है, बल्कि पहले के मुकाबले अब उनके बीच कहीं अधिक लोकप्रिय हो गई है. हालांकि कई लोग इस बात पर आश्चर्यचकित हैं कि केंद्र सरकार जाति-आधारित जनगणना क्यों नहीं कराना चाहती. भाजपा की जाति आधारित जनगणना ना कराने की मंशा के चलते बिहार के 11 राजनीतिक दल एक मंच पर आए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस साल जाति आधारित जनगणना कराने की मांग की. गौरतलब है कि प्रतिनिधिमंडल में बिहार भाजपा नेतृत्व भी शामिल था. यह सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर क्यों क्षेत्रीय दल जनगणना की मांग को लेकर एकजुट हैं और हाल के वर्षों में ओबीसी मतदाताओं को अपने पाले में लाने में सक्षम होने के बावजूद भाजपा ऐसा नहीं करना चाह रही है.

इसका जवाब स्पष्ट है. ओबीसी मतदाताओं के आधार वाले क्षेत्रीय दल मंडल के बाद समय में काफी लोकप्रिय हो गए. ओबीसी कल्याण के नाम पर वह नया जीवन पाने की जुगत में हैं. भाजपा पिछले कुछ वर्षों के दौरान ओबीसी वोट जुटाने में सफल रही है इसके बाद भी उसे इस बात का डर है कि उसका लोकप्रियता बरकरार भी रह पाएगी या नहीं. उसे डर है कि अगर क्षेत्रीय दल मंडल II से सामाजिक न्याय के नाम पर समुदाय की लामबंदी शुरू करते हैं तो भाजपा का ओबीसी समर्थन खिसक सकता है.

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और जनता दल-यूनाइटेड (JDU) और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) जैसे क्षेत्रीय दलों ने ओबीसी के लिए समर्थन किया और 1990 के दशक तक ओबीसी मतदाताओं का लंबे समय तक वोट हासिल किया. वास्तव में, ओबीसी मतदाता बड़ी संख्या में क्षेत्रीय दलों के समर्थन का बड़ा आधार बन गए. मंडल के बाद की राजनीति में कांग्रेस का हाशिए पर चली गई क्योंकि इसका कुछ ओबीसी समर्थन खिसक गया था. यह साफ है कि ओबीसी मतदाता बड़ी संख्या में हैं और वे प्रमुख रूप से क्षेत्रीय दलों के साथ रहते हैं. ऐसे में भाजपा ने राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष किया. मंडल का जवाब ‘कमंडल’ से देने में बीजेपी को वक्त लगा. साल 1990 के दशक की शुरुआत में मंडल की की राजनीति शुरू हुई लेकिन इस दशक के आखिरी में भाजपा ‘कमंडल की राजनीति’ से इसका जवाब दे पायी.

लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने साल 1998 और साल 1999 के लोकसभा चुनाव जीते और कुछ गठबंधन सहयोगियों के साथ गठबंधन सरकार बनाई. सरकार भाजपा ने बनाई लेकिन क्षेत्रीय दल तब भी मजबूत बने रहे. साल 1998 और साल 1999 के लोकसभा चुनावों के दौरान क्रमशः उन्हें 35.5% और 33.9% वोट मिले. बात साल 2004 और साल 2009 की करें तो इस दौरान भी क्षेत्रीय दल लोकप्रिय बने रहे. इस समयावधि में कांग्रेस के अगुवाई वाली सरकार बनी थी. इस दौरान क्षेत्रीय दलों को क्रमशः 39.3% और 37.3% वोट मिले. यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान जब बीजेपी ने 31% वोटों के साथ बहुमत हासिल किया. इसके बाद भी क्षेत्रीय दलों ने मिलकर 39% वोट हासिल किए.

हालांकि साल 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर पैठ बनाई, जिससे क्षेत्रीय दलों के मूल समर्थन में सेंध लगी. साल 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान, 22% ओबीसी ने भाजपा को वोट दिया, जबकि 42% ने क्षेत्रीय दलों को वोट दिया. लेकिन एक दशक के भीतर ओबीसी के बीच भाजपा का आधार नाटकीय रूप से बदला. साल 2019 के चुनावों के दौरान 44% ओबीसी ने भाजपा को वोट दिया, जबकि केवल 27% ने क्षेत्रीय दलों को वोट दिया. यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि ओबीसी मतदाताओं के बीच बीजेपी की लोकप्रियता बढ़ी.

दरअसल, भाजपा उत्तर भारत के कई राज्यों में लोवर ओबीसी को प्रभावशाली लोगों की तुलना में कहीं अधिक लामबंद करने में काफी सफल रही. लोवर ओबीसी की तुलना में अपर ओबीसी के बीच क्षेत्रीय दल अधिक लोकप्रिय रहे. उत्तर प्रदेश और बिहार के यादवों ने बड़ी संख्या में सपा और राजद के लिए वोट डाला, जबकि भाजपा इन राज्यों में लोवर ओबीसी जातियों को सफलतापूर्वक अपने खेमे में लाने में सफल रही. इसके अलावा भाजपा लोकसभा चुनाव के दौरान ओबीसी मतदाताओं की पसंद है, लेकिन राज्यों के चुनाव में ऐसा नहीं होता. साल 2019 के लोकसभा चुनावों की तुलना में 2020 के विधानसभा चुनावों के दौरान बड़ी संख्या में ओबीसी ने राजद को वोट दिया. इसी तरह यूपी में साल 2019 के आम चुनावों में केवल 14% ओबीसी ने सपा को वोट दिया लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में यह संख्या बढ़कर 29% हो गई, लेकिन पार्टी फिर भी लड़ाई हार गई. हम कई अन्य राज्यों में लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों के लिए ओबीसी के बीच मतदान में समान अंतर पाएंगे.

मुझे लगता है भाजपा द्वारा जाति जनगणना ना कराने की मंशा के पीछे यही डर है कि अगर यह पूरा हुआ तो क्षेत्रीय दलों को केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के कोटे को फिर से बदलने के लिए सत्तारूढ़ दल पर दबाव बनाने के लिए एक नया मुद्दा मिल सकता है और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी की संख्या केंद्र सरकार की नौकरियों में उनके कोटे के प्रतिशत से बहुत अधिक होने की संभावना है. इसका परिणाम मंडल II की स्थिति में हो सकता है. ऐसा लगता है कि ओबीसी के आंकड़े एक ऐसी प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं जिसे संभालना बेहद मुश्किल हो सकता है.

 डिस्क्लेमर: संजय कुमार सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक हैं. यह उनके निजी विचार हैं.

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